नर्मदा का नीर बना जीवन की नई उम्मीद
राजस्थान के बाड़मेर जिले में भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित सुंदरा गांव के लिए हाल ही में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है। वर्षों से पानी की गंभीर समस्या से जूझ रहे इस गांव में अब हर घर तक नल के जरिए स्वच्छ पेयजल पहुंच रहा है। यह उपलब्धि केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि गांव के लोगों के जीवन में एक नए युग की शुरुआत मानी जा रही है। लंबे समय से रेगिस्तानी कठिनाइयों से जूझते इस क्षेत्र में नर्मदा का पानी पहुंचना किसी सपने के सच होने जैसा है।
कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में बसा सुंदरा
सुंदरा गांव का इतिहास काफी पुराना है। सन् 1734 में स्थापित यह गांव क्षेत्रफल के हिसाब से कभी देश की सबसे बड़ी ग्राम पंचायतों में शामिल रहा है। लगभग 1345 वर्ग किलोमीटर में फैला यह इलाका प्राकृतिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। बाड़मेर मुख्यालय से करीब 170 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में वर्षों तक पेयजल की भारी किल्लत बनी रही। यहां का भूजल इतना खारा था कि इंसान ही नहीं, पशु भी इसे पीने से बचते थे। ट्यूबवेल जैसी सुविधाएं भी यहां कारगर साबित नहीं हो सकीं, जिसके चलते ग्रामीणों को 15 से 20 किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता था।
युद्ध और विस्थापन की चुनौतियां
सुंदरा गांव ने सिर्फ प्राकृतिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक कठिनाइयों का भी सामना किया है। 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान इस सीमा क्षेत्र के गांव को खाली कराना पड़ा था। इन परिस्थितियों ने गांव के विकास को और भी प्रभावित किया। लंबे समय तक बुनियादी सुविधाओं के अभाव में यहां का जीवन बेहद कठिन बना रहा।
नर्मदा परियोजना ने बदली तस्वीर
इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या का समाधान नर्मदा नहर आधारित पेयजल परियोजना के जरिए संभव हो पाया। सरदार सरोवर बांध से शुरू होकर नर्मदा का पानी लगभग 728 किलोमीटर का लंबा सफर तय कर सुंदरा तक पहुंचा है। करीब 513 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस परियोजना के तहत 200 से अधिक गांवों तक पानी पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया।
इस योजना में 16 बड़े जल संग्रहण केंद्र बनाए गए, कई पंपिंग स्टेशन स्थापित किए गए और 80 से अधिक एलिवेटेड सर्विस रिजर्वायर तैयार किए गए। रेगिस्तान के ऊंचे-ऊंचे टीलों के बीच पाइपलाइन बिछाना, बिजली की कमी और सीमा क्षेत्र की सुरक्षा चुनौतियों के बावजूद इस परियोजना को सफलतापूर्वक पूरा किया गया।
जीवन में आया बड़ा बदलाव
नर्मदा का पानी सुंदरा गांव के लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। गांव की बुजुर्ग महिलाओं ने पहली बार अपने घर के सामने मीठे पानी का नल देखा है। वर्षों तक खारा पानी पीने के कारण लोगों को कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा, जैसे दांतों का पीला होना और हड्डियों का कमजोर होना।
अब गांव की महिलाओं को रोजाना कई किलोमीटर दूर पानी लाने की मजबूरी से मुक्ति मिल गई है। इससे न केवल उनका समय बचेगा, बल्कि उनके जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर होगी। बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर भी इसका सकारात्मक असर देखने को मिलेगा।
विकास की नई राह पर सुंदरा
आज सुंदरा गांव में बहता नल का पानी केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि विकास और सम्मान का प्रतीक बन गया है। यह परियोजना इस बात का उदाहरण है कि सही योजना, तकनीकी क्षमता और दृढ़ संकल्प के साथ देश के सबसे कठिन क्षेत्रों में भी बदलाव संभव है। नर्मदा का यह नीर अब सुंदरा के लोगों के जीवन में खुशहाली और उम्मीद की नई धारा लेकर आया है।