News Image

‘तारीख पर तारीख’ पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, अब सुनवाई टालना होगा मुश्किल

 

देश की न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी और तेज बनाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कदम उठाया है। अदालत ने मामलों की सुनवाई को बार-बार टालने की प्रथा पर सख्ती दिखाते हुए नए नियम लागू कर दिए हैं। अब अदालतों में लंबे समय से चल रही ‘तारीख पर तारीख’ की समस्या को खत्म करने की कोशिश की जा रही है। इस फैसले के तहत अब केवल विशेष और असाधारण परिस्थितियों में ही सुनवाई स्थगित की जा सकेगी।

नए सर्कुलर से पुराने निर्देश हुए समाप्त

18 मार्च को जारी किए गए नए सर्कुलर में अदालत ने स्पष्ट किया है कि इससे पहले 29 नवंबर 2025 और 2 दिसंबर 2025 को जारी किए गए निर्देश अब लागू नहीं रहेंगे। उनकी जगह यह नया नियम प्रभावी होगा, जिसमें अलग-अलग प्रकार के मामलों के लिए अलग दिशानिर्देश तय किए गए हैं। इस बदलाव का उद्देश्य न्याय प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और समयबद्ध बनाना है।

रेगुलर मामलों में स्थगन पूरी तरह बंद

नए नियमों के तहत ‘रेगुलर मामलों’ में अब किसी भी प्रकार का एडजर्नमेंट यानी सुनवाई टालने की अनुमति नहीं होगी। इसका मतलब है कि यदि कोई मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हो चुका है, तो उसे किसी भी बहाने से आगे नहीं बढ़ाया जा सकेगा। यह निर्णय उन मामलों में देरी को रोकने के लिए लिया गया है, जो पहले बार-बार स्थगन के कारण वर्षों तक लंबित रहते थे।

फ्रेश और आफ्टर-नोटिस मामलों में सीमित छूट

जहां रेगुलर मामलों में पूरी तरह रोक लगा दी गई है, वहीं ‘फ्रेश’ और ‘आफ्टर-नोटिस’ मामलों में भी स्थगन की प्रक्रिया को काफी सख्त बना दिया गया है। यदि किसी पक्ष को सुनवाई टालनी है, तो उसे पहले से दूसरी पार्टी को इसकी सूचना देनी होगी और इसका प्रमाण भी प्रस्तुत करना होगा। यह पूरी प्रक्रिया सुनवाई से एक दिन पहले सुबह 11 बजे तक पूरी करनी होगी।

इसके साथ ही, दूसरी पार्टी को भी अपनी आपत्ति दर्ज कराने का पूरा अधिकार दिया गया है। वह दोपहर 12 बजे तक ईमेल के माध्यम से अपनी आपत्ति दर्ज कर सकती है, जिसे अदालत के सामने रखा जाएगा। इससे दोनों पक्षों को समान अवसर मिलेगा और किसी एक पक्ष द्वारा मनमाने तरीके से तारीख लेने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी।

ठोस कारण बताना होगा अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि अब केवल औपचारिक या कमजोर कारणों के आधार पर सुनवाई टालने की अनुमति नहीं मिलेगी। एडजर्नमेंट मांगने वाले पक्ष को ठोस और वैध कारण बताना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही यह भी बताना होगा कि पहले कितनी बार इस मामले में तारीख ली जा चुकी है। इस प्रावधान से अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि कोई भी पक्ष प्रक्रिया का दुरुपयोग न कर सके।

असाधारण परिस्थितियों में ही मिलेगी राहत

नए नियमों के अनुसार, केवल असाधारण परिस्थितियों में ही सुनवाई स्थगित की जा सकेगी। इनमें परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु, गंभीर बीमारी या अन्य कोई वास्तविक और अपरिहार्य कारण शामिल हो सकते हैं। हालांकि, अंतिम निर्णय अदालत के विवेक पर निर्भर करेगा कि वह कारण पर्याप्त है या नहीं।

बार-बार स्थगन पर पूरी तरह रोक

फ्रेश मामलों में एडजर्नमेंट की अनुमति केवल एक बार ही दी जाएगी। इसके अलावा लगातार दो बार सुनवाई टालने की अनुमति भी नहीं होगी, चाहे आवेदन किसी भी पक्ष की ओर से किया गया हो। इससे मामलों के अनावश्यक लंबा खिंचने पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जा सकेगा।

साथ ही, एडजर्नमेंट के लिए आवेदन एक निर्धारित प्रारूप (Annexure-A) में ही करना होगा और इसे तय ईमेल आईडी पर भेजना अनिवार्य होगा। इससे प्रक्रिया में पारदर्शिता और अनुशासन दोनों सुनिश्चित होंगे।

लंबित मामलों के बोझ को कम करने की पहल

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न्यायिक प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक बड़ा सुधार माना जा रहा है। लंबे समय से अदालतों में लंबित मामलों की संख्या बढ़ती जा रही थी, जिसका एक बड़ा कारण बार-बार सुनवाई टालना भी था। अब नए नियमों के लागू होने से उम्मीद है कि मामलों का निपटारा तेजी से होगा और आम लोगों को समय पर न्याय मिल सकेगा।