ईरान युद्ध के बीच अमेरिका-इजरायल में दरार के संकेत, बढ़ता तनाव बना वैश्विक चिंता का कारण
मध्य पूर्व में जारी युद्ध के बीच अब अमेरिका और इजरायल के रिश्तों में दरार की खबरें सामने आने लगी हैं। अब तक ईरान के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बनाकर कार्रवाई करने वाले डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच मतभेद खुलकर सामने आते दिखाई दे रहे हैं। युद्ध के 20 दिन बाद भी हालात शांत होने के बजाय और अधिक विस्फोटक होते जा रहे हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है।
बिना जानकारी के हमले से बढ़ा विवाद
तनाव उस समय बढ़ गया जब इजरायल ने अमेरिका को बिना जानकारी दिए ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमला कर दिया। इस हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया कि इस कार्रवाई में अमेरिका की कोई भूमिका नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें इस हमले की पूर्व जानकारी नहीं थी। इस बयान से यह संकेत मिला कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक समन्वय में कमी आई है।
इजरायल की इस कार्रवाई के बाद ईरान ने भी तुरंत जवाबी हमला करते हुए रास लफान गैस रिफाइनरी को निशाना बनाया। यह हमला बेहद गंभीर माना जा रहा है क्योंकि यह रिफाइनरी वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।
वैश्विक ऊर्जा बाजार पर खतरा
कतर स्थित रास लफान गैस रिफाइनरी दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी हब माना जाता है। यहां से वैश्विक गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा संचालित होता है। भारत समेत कई देशों की ऊर्जा जरूरतें इसी पर निर्भर हैं। इस हमले के बाद वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ने की आशंका जताई जा रही है, जिससे आर्थिक प्रभाव भी गहरा हो सकता है।
ईरान की आक्रामक रणनीति
ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ‘आंख के बदले आंख’ की नीति पर चलेगा। इजरायल द्वारा लगातार हमलों और शीर्ष नेताओं की हत्या के बाद ईरान ने अपनी सैन्य प्रतिक्रिया तेज कर दी है। इससे यह संकेत मिलता है कि आने वाले दिनों में संघर्ष और अधिक तीव्र हो सकता है।
अमेरिका के भीतर भी बढ़ता विरोध
इस युद्ध को लेकर अमेरिका के भीतर भी असहमति सामने आ रही है। नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर के प्रमुख जोसेफ केंट के इस्तीफे ने इस विवाद को और हवा दी है। उन्होंने अपने इस्तीफे में आरोप लगाया कि ईरान के खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया और अमेरिका को इस युद्ध में धकेला गया। इससे ट्रंप प्रशासन की रणनीति पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
ट्रंप-नेतन्याहू संबंधों में खटास
विश्लेषकों का मानना है कि यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप और नेतन्याहू के बीच मतभेद सामने आए हैं। इससे पहले भी इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष के दौरान ऐसे संकेत मिल चुके हैं कि दोनों नेताओं के बीच रणनीतिक मतभेद हैं। ताजा घटनाक्रम के बाद यह खटास और स्पष्ट हो गई है। ट्रंप द्वारा यह कहना कि इजरायल आगे साउथ पार्स पर हमला नहीं करेगा, यह दर्शाता है कि वे युद्ध को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं।
खाड़ी देशों की बढ़ती चिंता
इस पूरे घटनाक्रम ने खाड़ी देशों की चिंता भी बढ़ा दी है। सऊदी अरब सहित कई अरब देशों ने संकेत दिया है कि यदि स्थिति बिगड़ती है तो वे भी सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार हैं। प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद ने कहा कि उनके पास भी अपनी सुरक्षा के लिए सभी विकल्प खुले हैं। इससे यह आशंका बढ़ गई है कि यह संघर्ष एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है।