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ईरान में सत्ता परिवर्तन के बाद नया विवाद: मोजतबा खामेनेई का ‘अधूरा राजतिलक’ और धार्मिक जगत की नाराजगी

ईरान में हालिया सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक हलकों के साथ-साथ धार्मिक जगत में भी गहरी हलचल देखने को मिल रही है। अली खामेनेई के निधन के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को देश का नया सर्वोच्च नेता घोषित कर दिया गया है, लेकिन इस फैसले को लेकर शिया धार्मिक समुदाय में गंभीर असहमति उभरकर सामने आई है। इसी वजह से इसे ‘अधूरा राजतिलक’ कहा जा रहा है।

राजनीतिक स्वीकृति, लेकिन धार्मिक असहमति

ईरान की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ने मोजतबा खामेनेई के नाम पर मुहर लगा दी है। इस निर्णय के बाद वे औपचारिक रूप से देश के तीसरे सर्वोच्च नेता बन गए हैं। हालांकि, यह राजनीतिक स्वीकृति धार्मिक वैधता हासिल करने में असफल होती नजर आ रही है। शिया इस्लाम के प्रमुख धर्मगुरुओं ने या तो चुप्पी साध ली है या फिर अप्रत्यक्ष रूप से असहमति जताई है।

कुम में उठी असहमति की आवाज

ईरान का पवित्र शहर कुम, जो शिया इस्लाम का प्रमुख धार्मिक केंद्र माना जाता है, वहां इस फैसले को लेकर असंतोष बढ़ रहा है। यहां के बड़े धर्मगुरु मोजतबा की योग्यता पर सवाल उठा रहे हैं। उनका मानना है कि सर्वोच्च नेता बनने के लिए जिस धार्मिक विद्वता की आवश्यकता होती है, वह मोजतबा में नहीं है।

धार्मिक योग्यता पर उठे सवाल

ईरानी संविधान के अनुसार, सर्वोच्च नेता का ‘मुजतहिद’ होना अनिवार्य है, यानी उसे इस्लामी कानून का गहरा ज्ञान होना चाहिए। मोजतबा को ‘आयतुल्लाह’ की उपाधि दी जा रही है, लेकिन कई वरिष्ठ धर्मगुरु इस उपाधि को मान्यता देने से हिचक रहे हैं। इस्लामी मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि धार्मिक प्रतिष्ठान की चुप्पी अपने आप में विरोध का संकेत है।

प्रमुख धर्मगुरुओं की चुप्पी और संकेत

शिया समुदाय के कई प्रभावशाली धर्मगुरुओं ने मोजतबा खामेनेई को लेकर खुलकर समर्थन नहीं दिया है। अली सिस्तानी ने नए नेता का नाम लिए बिना केवल ‘उत्तराधिकारी’ के लिए शुभकामनाएं दीं, जिससे उनकी दूरी साफ झलकती है। वहीं वाहिद खुरासानी ने सिर्फ अली खामेनेई के निधन पर शोक व्यक्त किया और नए नेता को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की। इसी तरह जवादी अमोली ने भी अपने संदेश में मोजतबा का नाम तक नहीं लिया।

सरकारी समर्थन बनाम स्वतंत्र रुख

जहां कई प्रमुख धर्मगुरु चुप्पी साधे हुए हैं, वहीं कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने मोजतबा का समर्थन किया है। नूरी हमदानी ने उन्हें बधाई देते हुए समर्थन जताया, जबकि नासेर मकारेम शिराजी ने जनता से नए नेता के प्रति वफादारी की अपील की। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि यह समर्थन अधिकतर सरकारी विचारधारा से जुड़े धार्मिक नेताओं की ओर से आ रहा है।

इतिहास दोहराने के संकेत

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान स्थिति 1989 की याद दिलाती है, जब अली खामेनेई को सर्वोच्च नेता बनाया गया था। उस समय भी उनकी धार्मिक योग्यता को लेकर सवाल उठे थे। खुद अली खामेनेई ने उस समय अपने चयन को ‘तकनीकी रूप से कमजोर’ बताया था। आज मोजतबा के मामले में भी वैसी ही परिस्थितियां बनती नजर आ रही हैं।