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21 मार्च को मनाई जाएगी गणगौर पूजा, जानें व्रत का महत्व, मुहूर्त और विधि

 

चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला गणगौर पर्व इस वर्ष 21 मार्च 2026 को श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसमें वे अपने सुहाग की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए व्रत रखती हैं। अविवाहित कन्याएं भी इस दिन मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए पूजा करती हैं।

गणगौर शब्द दो भागों से मिलकर बना है, जिसमें ‘गण’ का अर्थ भगवान भगवान शिव और ‘गौर’ का अर्थ माता माता पार्वती से है। इस दिन शिव और पार्वती के दिव्य मिलन और दांपत्य जीवन के आदर्श स्वरूप की पूजा की जाती है।

गणगौर पूजा का शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल तृतीया तिथि 21 मार्च 2026 को सुबह 2 बजकर 30 मिनट पर प्रारंभ होगी और उसी दिन रात 11 बजकर 55 मिनट पर समाप्त होगी। पूजा के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 55 मिनट से लेकर 9 बजकर 26 मिनट तक रहेगा। इस दौरान विधिपूर्वक पूजा करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

गणगौर व्रत का धार्मिक महत्व

गणगौर पूजा का विशेष महत्व वैवाहिक जीवन से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा और नियमों के साथ करने से दांपत्य जीवन में प्रेम और सामंजस्य बना रहता है। विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य की कामना करती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं अच्छे और योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं।

इसके साथ ही यह भी माना जाता है कि इस पूजा से घर में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है। परिवार में खुशहाली बनी रहती है और सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं।

किन-किन राज्यों में मनाया जाता है गणगौर

गणगौर का पर्व विशेष रूप से राजस्थान में बड़े ही धूमधाम और पारंपरिक तरीके से मनाया जाता है। इसके अलावा मध्य प्रदेश और गुजरात में भी इस पर्व का व्यापक महत्व है।

राजस्थान में यह पर्व लगभग 18 दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत होलिका दहन के अगले दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से होती है और इसका समापन चैत्र शुक्ल तृतीया को होता है। इस दौरान महिलाएं प्रतिदिन गौरा-ईसर की पूजा करती हैं और पारंपरिक गीत गाती हैं।

गणगौर पूजा की पौराणिक कथा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एक बार भगवान भगवान शिव और माता माता पार्वती पृथ्वी पर भ्रमण के लिए आए। उस समय गांव की महिलाओं ने पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ माता पार्वती की पूजा की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने उन्हें अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद दिया।

तभी से इस परंपरा की शुरुआत हुई और महिलाएं हर वर्ष गणगौर का व्रत रखकर माता गौरी की आराधना करती हैं।

ईसर-गौरा पूजा की विधि

गणगौर पूजा में भगवान शिव को ईसर जी और माता पार्वती को गौरा माता के रूप में पूजा जाता है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं।

घर में मिट्टी या लकड़ी से बनी शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके बाद माता गौरी को सिंदूर, कुमकुम, हल्दी, मेहंदी, फूल और विभिन्न श्रृंगार सामग्री अर्पित की जाती है। यह पूजा विशेष रूप से सुहाग की वस्तुओं से की जाती है।

भोग के रूप में गुड़, गेहूं और विभिन्न प्रकार के मीठे पकवान अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद गणगौर की कथा सुनी जाती है और आरती की जाती है। महिलाएं समूह में एकत्र होकर पारंपरिक लोकगीत गाती हैं और कई स्थानों पर शोभायात्राएं भी निकाली जाती हैं।