बाड़मेर में अनोखा गणगौर उत्सव, आठ दिन तक नमक का त्याग और गुजराती गरबों से होता है माता का स्वागत
राजस्थान में महिलाओं के सबसे महत्वपूर्ण और लोकप्रिय त्योहारों में से एक गणगौर पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व की अपनी-अपनी परंपराएं और मान्यताएं हैं। इसी क्रम में बाड़मेर जिले में रहने वाले सांचीहार समाज में गणगौर का उत्सव बेहद अनोखे तरीके से मनाया जाता है। यहां महिलाएं आठ दिनों तक नमक का त्याग करती हैं और गुजराती गरबों की धुन पर माता गणगौर का स्वागत करती हैं।
आठ दिन तक नमक न खाने की परंपरा
भारत-पाकिस्तान सीमा के नजदीक बसे बाड़मेर जिले में सांचीहार समाज में गणगौर पर्व के दौरान एक खास परंपरा का पालन किया जाता है। इस समाज में गणगौर के आठ दिनों तक घर में बनने वाले सभी भोजन बिना नमक के तैयार किए जाते हैं। महिलाएं और परिवार के सदस्य इस दौरान नमक का पूरी तरह त्याग करते हैं और इस नियम का श्रद्धा के साथ पालन करते हैं।
समाज की मान्यता है कि इस व्रत और नियम से माता गणगौर प्रसन्न होती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि तथा खुशहाली बनी रहती है। इस दौरान महिलाएं रोजाना पूजा-अर्चना करती हैं और पूरे उत्साह के साथ पर्व का आनंद लेती हैं।
मंदिर में सामूहिक रूप से मनाया जाता है उत्सव
बाड़मेर शहर के जोशियो का वास क्षेत्र में स्थित बालार्क मंदिर में सांचीहार समाज की महिलाएं एकत्रित होकर गणगौर का उत्सव मनाती हैं। यहां हर दिन पूजा, गीत-संगीत और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
इन आठ दिनों में कुंवारी कन्याओं से लेकर विवाहित महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा पहनकर माता गणगौर की पूजा करती हैं। मंदिर परिसर में महिलाएं एक साथ इकट्ठा होकर पूजा-अर्चना करती हैं और पारंपरिक लोकगीत गाते हुए इस पर्व को विशेष रूप से मनाती हैं।
समाज की बुजुर्ग महिला गायत्री जोशी के अनुसार यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी पूरे उत्साह के साथ निभाई जाती है। उनका कहना है कि यह व्रत परिवार की खुशहाली और समृद्धि के लिए किया जाता है।
गुजराती गरबों से होता है माता का स्वागत
सांचीहार समाज में गणगौर पर्व की एक और खास पहचान गुजराती शैली के गरबे हैं। यहां महिलाएं समूह में एकत्रित होकर गुजराती गरबों की धुन पर नृत्य करती हैं और माता गणगौर का स्वागत करती हैं।
गरबा करते समय महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और नृत्य के माध्यम से अपनी श्रद्धा व्यक्त करती हैं। यह दृश्य बेहद आकर्षक और उत्साहपूर्ण होता है, जिसमें पूरे समाज की महिलाएं भाग लेती हैं। इस दौरान माहौल बिल्कुल उत्सव जैसा हो जाता है और मंदिर परिसर में भक्ति और आनंद का वातावरण बन जाता है।
पारंपरिक वेशभूषा और सोलह श्रृंगार की झलक
गणगौर के इस उत्सव में महिलाएं पारंपरिक परिधान पहनकर सजती हैं और सोलह श्रृंगार करती हैं। रंग-बिरंगे परिधानों और आभूषणों से सजी महिलाएं जब गरबा करती हैं तो पूरा वातावरण उत्सवमय हो उठता है।
समाज की युवतियां और नवविवाहित महिलाएं भी इस पर्व में बढ़-चढ़कर भाग लेती हैं। पहली बार अपने ससुराल में गणगौर मना रही हेतल जोशी बताती हैं कि उनके समाज में यह पर्व बहुत उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजकर माता गणगौर की पूजा करती हैं और गरबों की धुन पर नृत्य करते हुए उनका स्वागत करती हैं।
बदलते समय में भी कायम है परंपरा
समय के साथ जीवनशैली में कई बदलाव आए हैं, लेकिन सांचीहार समाज में गणगौर की यह अनोखी परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। समाज की महिलाएं इस पर्व को अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती हैं।
यही कारण है कि हर वर्ष गणगौर के अवसर पर बाड़मेर में यह अनोखा उत्सव देखने को मिलता है, जिसमें परंपरा, भक्ति और सांस्कृतिक रंगों का सुंदर संगम नजर आता है।