15 मार्च को मनाई जाएगी पापमोचिनी एकादशी, परिघ योग में किया जाएगा व्रत और पूजन
हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। फाल्गुन मास के बाद चैत्र कृष्ण पक्ष में आने वाली पापमोचिनी एकादशी इस वर्ष 15 मार्च को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से मनुष्य के पापों का नाश होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन विशेष रूप से भगवान भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है और पौराणिक कथा का श्रवण किया जाता है।
इस वर्ष पापमोचिनी एकादशी के दिन परिघ योग का संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार परिघ योग में किए गए धार्मिक कार्य और उपाय विशेष फलदायी माने जाते हैं। इस योग में शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के उपाय भी किए जाते हैं।
पापमोचिनी एकादशी का धार्मिक महत्व
पापमोचिनी एकादशी का व्रत चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखकर भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और उनसे अपने पापों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। पूजा के समय पंचामृत, तुलसी के पत्ते, पीले फूल, धूप और दीप से भगवान की आराधना की जाती है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस व्रत को करने से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि इस व्रत का महत्व इतना अधिक है कि इसके प्रभाव से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति भी हो सकती है।
भगवान श्रीकृष्ण ने बताया था व्रत का महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पापमोचिनी एकादशी के महत्व और इसकी विधि के बारे में प्रश्न किया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें इस व्रत का महत्व और इससे जुड़ी कथा विस्तार से बताई थी।
भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार इस व्रत का पालन करने से व्यक्ति अपने जीवन में किए गए पापों से मुक्त हो सकता है और उसे आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
पापमोचिनी एकादशी की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार इस व्रत की कथा ब्रह्मा ने नारद मुनि को सुनाई थी। कथा के अनुसार चित्ररथ वन में इंद्र और गंधर्व कन्याएं अक्सर भ्रमण करने जाया करती थीं। उसी वन में मेधावी नाम के एक ऋषि भगवान भगवान शिव की कठोर तपस्या कर रहे थे।
मेधावी ऋषि ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए भगवान शिव को प्रसन्न करने में लीन थे। एक दिन उसी वन में मंजुघोषा नाम की एक अप्सरा पहुंची। वह ऋषि के आश्रम के पास बैठकर वीणा बजाने लगी और मधुर गीत गाने लगी। उसके संगीत से मेधावी ऋषि का ध्यान भंग हो गया।
मंजुघोषा को देखकर ऋषि उस पर मोहित हो गए और अपनी तपस्या का उद्देश्य भूलकर उसके साथ रहने लगे। समय बीतता गया और देखते ही देखते 57 वर्ष बीत गए।
श्राप और मुक्ति की कथा
एक दिन मंजुघोषा ने मेधावी ऋषि से स्वर्ग लौटने की अनुमति मांगी। यह सुनकर ऋषि को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्हें लगा कि मंजुघोषा के कारण उनकी तपस्या भंग हुई है और वे अपने मार्ग से भटक गए हैं। क्रोध में आकर उन्होंने मंजुघोषा को पिशाचनी बनने का श्राप दे दिया।
श्राप सुनकर मंजुघोषा भयभीत हो गई और उसने ऋषि से इस श्राप से मुक्ति का उपाय पूछा। तब मेधावी ऋषि ने उसे बताया कि जब चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी आए, तब वह विधि-विधान से व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करे। इससे उसके पाप नष्ट हो जाएंगे और उसे मुक्ति मिल जाएगी।
बाद में मेधावी ऋषि अपने पिता के पास पहुंचे। उनके पिता ने भी उन्हें अपनी भूल का प्रायश्चित करने के लिए पापमोचिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।
व्रत से मिली मुक्ति
पापमोचिनी एकादशी के दिन मंजुघोषा और मेधावी ऋषि दोनों ने विधिपूर्वक व्रत और पूजा की। भगवान विष्णु की कृपा से मंजुघोषा को श्राप से मुक्ति मिल गई और वह फिर से स्वर्ग चली गई। वहीं मेधावी ऋषि भी अपने पापों से मुक्त हो गए।
धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक पापमोचिनी एकादशी का व्रत करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है।
पापमोचिनी एकादशी 2026 का शुभ मुहूर्त
वर्ष 2026 में चैत्र कृष्ण एकादशी तिथि का प्रारंभ 14 मार्च को सुबह 8 बजकर 10 मिनट से होगा और इसका समापन 15 मार्च को सुबह 9 बजकर 16 मिनट पर होगा।
परिघ योग प्रातःकाल से लेकर सुबह 10 बजकर 25 मिनट तक रहेगा। पापमोचिनी एकादशी की पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 8 बजकर 1 मिनट से दोपहर 12 बजकर 30 मिनट तक रहेगा।
वहीं व्रत का पारण 16 मार्च को सुबह 6 बजकर 30 मिनट से सुबह 8 बजकर 54 मिनट के बीच किया जा सकता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस समय व्रत का पारण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
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