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बाड़मेर के सनावड़ा में धुलंडी पर सजी ‘गैर’ की रंगत

 

रेगिस्तानी जिले बाड़मेर के छोटे से गांव सनावड़ा में धुलंडी के अवसर पर लोक संस्कृति का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। होलिका दहन के अगले दिन आयोजित होने वाला पारंपरिक ‘गैर’ नृत्य इस बार भी पूरे उत्साह और भव्यता के साथ संपन्न हुआ। लाल-सफेद पारंपरिक ‘आंगी’ वेशभूषा में सजे सैकड़ों कलाकारों ने ढोल-थाली की थाप पर सामूहिक नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

सनावड़ा गांव, जो जिला मुख्यालय से लगभग 33 किलोमीटर दूर स्थित है, हर वर्ष धुलंडी पर इस ऐतिहासिक आयोजन का साक्षी बनता है। दूर-दराज के क्षेत्रों से हजारों लोग इस लोकनृत्य को देखने और उसमें सहभागी बनने के लिए यहां पहुंचते हैं। ढोल-नगाड़ों की गूंज, थालियों की खनक और समवेत लय में थिरकते गैरियों का समूह नृत्य पूरे वातावरण को उत्सवमय बना देता है।

तीन पीढ़ियों का संगम बना आकर्षण का केंद्र

इस वर्ष के आयोजन की सबसे विशेष और प्रेरणादायक झलक एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों का एक साथ मंच पर उतरना रहा। दादा, पिता और पुत्र ने पारंपरिक आंगी पहनकर एक साथ कदमताल की और सदियों पुरानी इस विरासत को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।

तीनों पीढ़ियों की साझी प्रस्तुति ने यह संदेश दिया कि बदलते समय के बावजूद लोक परंपराएं आज भी परिवारों में जीवित हैं। दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ इस प्रस्तुति का स्वागत किया। यह दृश्य केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक निरंतरता और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक बन गया।

185 वर्ष पुरानी परंपरा का इतिहास

इतिहासकारों और स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार गैर नृत्य की परंपरा लगभग 185 वर्ष पुरानी है। इसकी शुरुआत महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी थी। खेती-किसानी के बाद जब महिलाएं गांव में कार्यरत रहती थीं, तब पुरुष डंडों के साथ पहरेदारी करते थे। समय के साथ इन डंडों को लय और ताल के साथ जोड़ दिया गया और यही परंपरा आगे चलकर ‘गैर’ नृत्य के रूप में विकसित हुई।

आज यह नृत्य केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि पश्चिमी राजस्थान की पहचान और गौरव का प्रतीक बन चुका है। पारंपरिक आंगी, समन्वित कदमताल और डंडों की तालबद्ध टकराहट इस नृत्य को विशिष्ट बनाती है।

1982 एशियाई खेल में गूंजी गैर की थाप

गैर नृत्य की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1982 में दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों के उद्घाटन समारोह में बाड़मेर के गैर कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति दी थी। उस मंच पर प्रस्तुत किए गए इस लोकनृत्य ने राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान दिलाई।

एशियाड के मंच से मिली पहचान के बाद गैर नृत्य को देशभर में सराहा जाने लगा और यह राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में स्थापित हुआ।

संस्कृति और उत्सव का जीवंत संगम

धुलंडी पर सनावड़ा में आयोजित यह कार्यक्रम न केवल होली के रंगों को नई ऊर्जा देता है, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने का माध्यम भी बनता है। परंपरा और आधुनिकता के इस संगम में जहां बुजुर्ग अपनी विरासत सौंपते नजर आते हैं, वहीं युवा पीढ़ी उसे गर्व के साथ आगे बढ़ाने का संकल्प लेती है।

गैर नृत्य का यह वार्षिक आयोजन बाड़मेर की सांस्कृतिक जीवंतता और लोकधरोहर के संरक्षण का सशक्त उदाहरण है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का काम कर रहा है।