आज से शुरू हुआ होलाष्टक, जानें आठ दिनों का धार्मिक महत्व
सनातन परंपरा में फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से पूर्णिमा तक के आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता है। वर्ष 2026 में होलाष्टक की शुरुआत 24 फरवरी से हो रही है और यह 3 मार्च तक रहेगा। इन आठ दिनों को विशेष आध्यात्मिक साधना और उपासना का समय माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जहां कुछ कार्य इस अवधि में अत्यंत फलदायी माने जाते हैं, वहीं कुछ मांगलिक कार्यों को वर्जित बताया गया है।
होलाष्टक का धार्मिक आधार
पौराणिक कथाओं के अनुसार होलाष्टक की अवधि भक्त प्रह्लाद और उनके पिता हिरण्यकश्यप से जुड़ी घटनाओं की स्मृति में महत्वपूर्ण मानी जाती है। मान्यता है कि इन दिनों में भक्त प्रह्लाद ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद भगवान विष्णु की भक्ति नहीं छोड़ी और अंततः भगवान ने नृसिंह अवतार लेकर उनकी रक्षा की। इसलिए इस समय को भक्ति, तप और साधना के लिए विशेष रूप से शुभ माना गया है।
होलाष्टक में क्या करें
धार्मिक मान्यता के अनुसार होलाष्टक के आठ दिनों में भगवान श्री विष्णु की विधि-विधान से पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। श्रद्धालुओं को प्रतिदिन विष्णु मंत्रों का जप करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि जिस प्रकार भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी, उसी प्रकार सच्ची श्रद्धा से की गई पूजा से जीवन के कष्ट दूर होते हैं।
आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों को इन दिनों में माता लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु की आराधना करनी चाहिए। प्रतिदिन श्रीसूक्त और ऋण मोचन मंगल स्तोत्र का पाठ करने से धन संबंधी बाधाएं दूर होने की मान्यता है।
होलाष्टक के दौरान यदि कोई व्यक्ति रोग, शोक या अन्य संकटों से परेशान है, तो उसे भगवान शिव की विशेष साधना करनी चाहिए। इन दिनों में रुद्राष्टक का पाठ और महामृत्युंजय मंत्र का जप करना अत्यंत फलदायी माना गया है। इससे नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
इसके अलावा नृसिंह भगवान या भगवान श्रीकृष्ण की उपासना भी विशेष फलदायी मानी गई है। जो श्रद्धालु इन दिनों में भगवान श्रीकृष्ण को अबीर-गुलाल अर्पित करते हुए विधिपूर्वक पूजा करते हैं, उन्हें सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
होलाष्टक की समाप्ति पर होलिका दहन वाले दिन शुभ मुहूर्त में होलिका पूजन करना चाहिए। मान्यता है कि होलिका पूजन से जीवन की व्याधियां और नकारात्मक शक्तियां समाप्त होती हैं तथा सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
होलाष्टक में क्या न करें
सनातन मान्यताओं के अनुसार होलाष्टक के आठ दिनों में किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य नहीं करने चाहिए। शादी, सगाई, तिलक, मुंडन, गृह प्रवेश, जनेऊ संस्कार जैसे शुभ कार्य इस अवधि में वर्जित माने गए हैं। ऐसा विश्वास है कि इन दिनों किए गए मांगलिक कार्यों में बाधाएं आ सकती हैं।
इसके अतिरिक्त होलाष्टक के दौरान बाल और नाखून काटने से भी परहेज करना चाहिए। यह समय संयम और साधना का माना गया है, इसलिए व्यक्ति को वाद-विवाद और कलह से दूर रहना चाहिए। नकारात्मक विचारों और नकारात्मक संगति से बचना भी आवश्यक बताया गया है।
खान-पान में भी सात्विकता बनाए रखना जरूरी है। मांस, मदिरा और अन्य तामसिक पदार्थों का सेवन इन दिनों में नहीं करना चाहिए। सात्विक भोजन और संयमित जीवनशैली से आध्यात्मिक ऊर्जा में वृद्धि होती है।
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