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रमज़ान में जकात का महत्व और सही तरीका

रमज़ान का पवित्र महीना इबादत, सब्र और इंसानियत की सेवा का संदेश देता है। इस महीने में मुसलमान रोज़ा रखते हैं, नमाज़ अदा करते हैं और जरूरतमंदों की मदद करने पर विशेष ध्यान देते हैं। इसी क्रम में जकात अदा करना एक अहम धार्मिक फर्ज माना गया है। बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जकात क्या है, इसे किन चीजों पर देना होता है और इसकी सही गणना कैसे की जाए। इन सभी पहलुओं को समझना जरूरी है ताकि यह फर्ज सही तरीके से अदा किया जा सके।

जकात क्या है

जकात इस्लाम के पांच बुनियादी स्तंभों में से एक है। यह हर उस मुसलमान पर अनिवार्य है जिसकी संपत्ति एक निश्चित सीमा से अधिक हो जाती है। जकात का उद्देश्य केवल दान देना नहीं है, बल्कि अपनी कमाई को पाक करना और समाज में आर्थिक संतुलन बनाए रखना भी है। इस्लामी मान्यता के अनुसार जकात देने से माल में बरकत आती है और जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचती है।

जकात साल में किसी भी समय दी जा सकती है, लेकिन रमज़ान में इसे अदा करना ज्यादा सवाब वाला माना जाता है। यही कारण है कि अधिकतर लोग इसी महीने अपनी जकात निकालते हैं।

निसाब क्या होता है

जकात देने की अनिवार्यता ‘निसाब’ पर निर्भर करती है। निसाब वह न्यूनतम संपत्ति या धनराशि है, जिसके ऊपर जकात देना जरूरी हो जाता है। इसकी गणना सोने या चांदी की कीमत के आधार पर की जाती है। आम तौर पर निसाब लगभग 87.48 ग्राम सोने या 612.36 ग्राम चांदी के बराबर माना जाता है।

यदि किसी व्यक्ति की कुल जकात योग्य संपत्ति लगातार एक हिजरी वर्ष तक इस सीमा से ऊपर रहती है, तो उस पर जकात देना फर्ज हो जाता है। इसलिए यह जरूरी है कि व्यक्ति अपनी संपत्ति का सही आकलन करे।

किन चीजों पर लगती है जकात

अक्सर लोग समझते हैं कि केवल नकद धन पर ही जकात लगती है, जबकि ऐसा नहीं है। जकात योग्य संपत्ति में नकद बचत, बैंक बैलेंस, घर में रखी रकम, सोना-चांदी, व्यापार का माल, निवेश से प्राप्त मुनाफा, किराये से बची हुई रकम और वह पैसा भी शामिल होता है जो किसी से उधार के रूप में वापस मिलना हो।

हालांकि रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं पर जकात नहीं लगती। जैसे रहने का घर, निजी उपयोग की गाड़ी, कपड़े, फर्नीचर और घरेलू सामान जकात के दायरे में नहीं आते।

जकात की गणना कैसे करें

जकात निकालने की प्रक्रिया सरल है। सबसे पहले अपनी सभी जकात योग्य संपत्तियों को जोड़ लें। इसके बाद वह कर्ज या देनदारियां घटा दें जिन्हें एक साल के भीतर चुकाना है। जो शुद्ध राशि बचेगी, उसका 2.5 प्रतिशत जकात के रूप में देना अनिवार्य होता है।

उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति की शुद्ध जकात योग्य संपत्ति पांच लाख रुपये है, तो उसका 2.5 प्रतिशत यानी 12,500 रुपये जकात बनती है। यह राशि जरूरतमंदों में वितरित की जानी चाहिए।

जकात कब और किसे दें

जकात देने की तारीख उस दिन से तय होती है जब आपकी संपत्ति पहली बार निसाब से ऊपर पहुंची थी। उसी इस्लामी तारीख को हर साल जकात अदा की जानी चाहिए।

जकात गरीबों, जरूरतमंदों, कर्जदारों और मुसाफिरों को दी जा सकती है। हालांकि माता-पिता, दादा-दादी, बच्चों या जीवनसाथी को जकात नहीं दी जा सकती, क्योंकि उनकी जिम्मेदारी पहले से आप पर होती है।


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