वाराणसी की मसान होली: आस्था, वैराग्य और अद्वितीय परंपरा का संगम
कुछ ही दिनों में होली का पर्व आने वाला है और देशभर में इसकी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। भारत में होली रंग, उमंग और उल्लास का प्रतीक है, लेकिन उत्तर प्रदेश के पवित्र शहर वाराणसी में मनाई जाने वाली मसान होली इसे एक अलग ही आध्यात्मिक आयाम देती है। इस वर्ष यह अनोखी होली 28 फरवरी को मनाई जाएगी। हालांकि हाल ही में काशी विद्वत परिषद ने मणिकर्णिका घाट पर आयोजित होने वाली मसान होली को लेकर आपत्ति जताई है। परंपरागत रूप से यह आयोजन हरिश्चंद्र घाट पर होता आया है, जो शहर के सबसे प्राचीन और सक्रिय श्मशान घाटों में से एक माना जाता है।
कब और कैसे होती है शुरुआत
मसान होली का आरंभ रंगभरी एकादशी से माना जाता है। इसी दिन से हरिश्चंद्र घाट पर उत्सव की तैयारियां प्रारंभ हो जाती हैं। मुख्य आयोजन अगली सुबह होता है, जब बाबा महाशमशान नाथ की विशेष पूजा और आरती के बाद सुबह लगभग 10 बजे से मसान होली खेली जाती है। आरती के पश्चात श्मशान घाट का वातावरण पूरी तरह बदल जाता है। मंत्रोच्चार, डमरू की ध्वनि और हर-हर महादेव के जयकारों के बीच यह स्थान एक आध्यात्मिक अखाड़े का रूप ले लेता है, जहां भक्ति और वैराग्य का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
कौन लेते हैं भाग
मसान होली को परंपरागत रूप से भगवान शिव के गणों का उत्सव माना जाता है। शैव परंपरा में शिव के गणों को रहस्यमय, तांत्रिक और तपस्वी स्वरूप में देखा जाता है। इस आयोजन में मुख्य रूप से अघोरी, नागा साधु, संन्यासी और शिवभक्त शामिल होते हैं। ये साधु श्मशान में जल रही चिताओं की ताजी राख से एक-दूसरे के साथ होली खेलते हैं।
हालांकि इस अद्वितीय दृश्य को देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक और आम लोग भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं, लेकिन धार्मिक जानकारों का कहना है कि यह कोई पर्यटन आकर्षण नहीं, बल्कि अत्यंत संवेदनशील और आध्यात्मिक अनुष्ठान है। विशेष रूप से विद्यार्थियों, गृहस्थों और बच्चों को चिता की राख से सीधे होली खेलने से बचने की सलाह दी जाती है। उनके लिए इस परंपरा को सम्मानपूर्वक देखना और उसकी गरिमा बनाए रखना अधिक उचित माना जाता है।
पौराणिक कथा और आध्यात्मिक आधार
मसान होली की जड़ें शैव पौराणिक कथाओं में निहित हैं। मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव देवी पार्वती का गौना कराकर काशी लौटे थे। उस अवसर पर उन्होंने देवताओं और भक्तों के साथ रंगों की होली खेली। किंतु उनके गण, जो श्मशान और वैराग्य से जुड़े माने जाते हैं, इस उत्सव में शामिल नहीं हो सके।
कथा के अनुसार अगले दिन भगवान शिव स्वयं श्मशान पहुंचे और रंगों के स्थान पर भस्म से अपने गणों के साथ होली खेली। यह परंपरा समानता और अस्तित्व की स्वीकृति का प्रतीक मानी जाती है। चिता की राख का प्रयोग इस सत्य की याद दिलाता है कि अंततः हर शरीर भस्म में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार श्मशान में होली खेलना मृत्यु के भय पर विजय और जीवन-मृत्यु के चक्र को स्वीकार करने का प्रतीक है।
आयोजन की प्रक्रिया और वातावरण
दिन की शुरुआत हरिश्चंद्र घाट स्थित बाबा महाशमशान नाथ मंदिर में विशेष पूजा से होती है। पूजा के बाद साधु और भक्त चिताओं से प्राप्त ताजी राख को पवित्र प्रसाद के रूप में एक-दूसरे पर लगाते हैं। वातावरण में डमरू की गूंज और शिवभक्ति के स्वर भर जाते हैं। साधु नृत्य करते हैं और पूरा श्मशान स्थल भक्ति, रहस्य और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो उठता है।
मसान होली केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि जीवन की अनित्यता और आत्मिक मुक्ति का संदेश देने वाली परंपरा है। यह काशी की आध्यात्मिक पहचान को और अधिक गहराई प्रदान करती है, जहां उत्सव और वैराग्य एक साथ दिखाई देते हैं।