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महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती: वैदिक धर्म के पुनर्जागरण के अग्रदूत की प्रेरक जीवनी

आज आर्य समाज के संस्थापक और वैदिक धर्म के प्रखर प्रचारक महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती की 194वीं जयंती मनाई जा रही है। भारतीय समाज को धार्मिक आडंबरों और कुरीतियों से मुक्त करने का संकल्प लेने वाले स्वामी दयानंद का जीवन संघर्ष, ज्ञान और सामाजिक क्रांति का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने न केवल वैदिक धर्म को सर्वोपरि बताया, बल्कि समाज को तर्क और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी दी।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा (तत्कालीन मोरबी राज्य) में एक समृद्ध ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम मूलशंकर तिवारी था। उनके पिता करशनजी तिवारी धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे और परिवार में नियमित रूप से पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठान होते थे। बचपन से ही मूलशंकर पर धार्मिक संस्कारों का गहरा प्रभाव पड़ा।

एक घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। महाशिवरात्रि के अवसर पर पिता के कहने पर उन्होंने उपवास रखा और रात्रि जागरण के लिए शिव मंदिर में ठहरे। आधी रात को उन्होंने देखा कि चूहे भगवान शिव की मूर्ति पर चढ़कर प्रसाद खा रहे हैं। यह दृश्य देखकर उनके मन में प्रश्न उठा कि जो मूर्ति स्वयं की रक्षा नहीं कर सकती, वह मनुष्य की रक्षा कैसे कर सकती है। इसी घटना ने उनके मन में मूर्ति पूजा के प्रति संदेह और सत्य की खोज की जिज्ञासा उत्पन्न की।

सत्य की खोज और संन्यास

आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए मूलशंकर ने घर त्यागने का निर्णय लिया। वर्ष 1846 में मात्र 21 वर्ष की आयु में उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया और ज्ञान की खोज में निकल पड़े। अनेक संतों और विद्वानों से मिलते हुए अंततः वे स्वामी विरजानंद के सान्निध्य में पहुंचे। स्वामी विरजानंद ने उन्हें वेदों का गहन अध्ययन कराया और समाज सुधार का दायित्व सौंपा।

गुरु से दीक्षा प्राप्त करने के बाद मूलशंकर ने स्वयं को दयानंद सरस्वती के रूप में स्थापित किया। उन्होंने जीवनभर वेदों और उपनिषदों के अध्ययन एवं प्रचार-प्रसार को अपना ध्येय बनाया। उनका मानना था कि निराकार ओमकार में ही ईश्वर का अस्तित्व है और वेद ही सच्चे ज्ञान का स्रोत हैं।

सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष

महर्षि दयानंद ने समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों का खुलकर विरोध किया। उन्होंने बाल विवाह, सती प्रथा, मूर्ति पूजा और जाति आधारित भेदभाव का कड़ा प्रतिरोध किया। उनके अनुसार, ब्राह्मण वह है जो ज्ञान का उपासक हो और अज्ञानियों को ज्ञान प्रदान करे। उन्होंने वर्ण व्यवस्था को जन्म के आधार पर नहीं बल्कि कर्म के आधार पर स्वीकार करने की बात कही।

नारी शिक्षा और विधवा विवाह के समर्थन में उन्होंने खुलकर आवाज उठाई। उस समय जब समाज रूढ़िवादी मान्यताओं में जकड़ा हुआ था, स्वामी दयानंद ने तर्क और शास्त्रों के आधार पर परिवर्तन की राह दिखाई। उनके विचारों ने समाज में एक नई चेतना का संचार किया।

आर्य समाज की स्थापना

सामाजिक और धार्मिक सुधारों को संगठित रूप देने के उद्देश्य से स्वामी दयानंद ने 1875 में गुड़ी पड़वा के दिन मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की। आर्य समाज का मूल उद्देश्य वैदिक धर्म का प्रचार और मानव धर्म की स्थापना था। संस्था ने शिक्षा, समाज सुधार और राष्ट्र जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आर्य समाज के माध्यम से उन्होंने वेदों के संदेश को जन-जन तक पहुंचाया। प्रारंभ में वे अपने प्रवचन संस्कृत में देते थे, लेकिन केशवचंद्र सेन के सुझाव पर उन्होंने हिंदी में भाषण देना शुरू किया। इससे उनके विचार आम लोगों तक आसानी से पहुंच सके और एक व्यापक जनजागरण हुआ।

राष्ट्रभक्ति और स्वतंत्रता चेतना

महर्षि दयानंद केवल धार्मिक सुधारक ही नहीं, बल्कि एक प्रखर राष्ट्रभक्त भी थे। 1857 की क्रांति के दौरान उन्होंने स्वतंत्रता की भावना को बल दिया। कहा जाता है कि तात्या टोपे, नाना साहेब पेशवा जैसे कई क्रांतिकारी उनके विचारों से प्रेरित थे। उन्होंने सबसे पहले स्वराज्य का संदेश दिया, जिसे आगे चलकर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने जनआंदोलन का स्वरूप दिया।

उनका मानना था कि राष्ट्र की उन्नति शिक्षा, आत्मनिर्भरता और नैतिक मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए। उन्होंने भारतीयों में आत्मगौरव की भावना जगाई और विदेशी शासन के विरुद्ध मानसिक क्रांति का बीजारोपण किया।

अंतिम समय और विरासत

स्वामी दयानंद सरस्वती को अपने विचारों के कारण कई विरोधों और षड्यंत्रों का सामना करना पड़ा। 30 अक्टूबर 1883 को एक षड्यंत्र के तहत उन्हें विष देकर मृत्यु के घाट उतार दिया गया। हालांकि उनका शरीर नश्वर था, लेकिन उनके विचार अमर हो गए।

आज देशभर में उनके नाम पर अनेक शिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं, जिनमें महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय प्रमुख है। आर्य समाज आज भी शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र में सक्रिय है।

महर्षि दयानंद सरस्वती का जीवन सत्य, तर्क और साहस की मिसाल है। उन्होंने समाज को अंधविश्वास से मुक्त कर वैदिक ज्ञान की ओर लौटने का आह्वान किया। उनकी जयंती पर उनके विचारों को स्मरण करना और उन्हें जीवन में उतारना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।