कमरे में लगी LED लाइट्स बन सकती हैं सेहत के लिए खतरा, दिमाग और नींद पर डालती हैं गहरा असर
आज के दौर में LED और दूसरी आर्टिफिशियल लाइट्स को ऊर्जा बचाने वाला और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प माना जाता है। घर, ऑफिस और सड़कों पर इनका इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। हालांकि, वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इन लाइट्स से निकलने वाली रोशनी, खासकर ब्लू लाइट, हमारी सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकती है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, आर्टिफिशियल लाइट्स के आने से पहले सूर्य ही रोशनी का मुख्य स्रोत था और शाम होते ही लोग काफी हद तक अंधेरे में चले जाते थे। आज स्थिति यह है कि सूरज ढलने के बाद भी चारों तरफ तेज रोशनी रहती है, जिसे हम सामान्य मानने लगे हैं।
बायोलॉजिकल क्लॉक पर असर
रात के समय तेज रोशनी शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक यानी सर्केडियन रिदम को प्रभावित करती है। सर्केडियन रिदम हमारे सोने-जागने, हार्मोन रिलीज और शरीर की कई जैविक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करती है। रिसर्च बताती है कि रात में रोशनी के संपर्क में रहने से नींद की गुणवत्ता बिगड़ती है। लंबे समय तक ऐसा होने पर यह डायबिटीज, हृदय रोग, मोटापा और कुछ मामलों में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के खतरे को भी बढ़ा सकता है।
ब्लू लाइट क्या है और क्यों है खतरनाक
हर रंग की रोशनी का शरीर पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। ब्लू वेवलेंथ वाली रोशनी दिन के समय फायदेमंद मानी जाती है, क्योंकि यह ध्यान, मूड और रिएक्शन टाइम को बेहतर बनाती है। लेकिन यही ब्लू लाइट रात में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। मोबाइल, लैपटॉप, टीवी स्क्रीन और LED लाइट्स से निकलने वाली ब्लू लाइट सूर्यास्त के बाद भी दिमाग को यह संकेत देती है कि अभी दिन है।
रोशनी और नींद का संबंध
औसतन इंसान की सर्केडियन रिदम लगभग 24 घंटे 15 मिनट की होती है, हालांकि यह हर व्यक्ति में थोड़ी अलग हो सकती है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डॉ. चार्ल्स जाइस्लर ने अपने शोध में बताया था कि प्राकृतिक दिन की रोशनी शरीर की अंदरूनी घड़ी को वातावरण के साथ संतुलन में रखती है। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो नींद देर से आती है और नींद पूरी नहीं हो पाती।
LED लाइट्स से होने वाली समस्याएं
Vision Lighting के अनुसार, LED लाइट्स में बहुत तेज फ्लिकर होता है, जिसे आंखें सीधे नहीं देख पातीं, लेकिन दिमाग इसे महसूस करता है। इससे आंखों में थकान, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन और रात में बेचैनी बढ़ सकती है। साथ ही, ब्लू लाइट मेलाटोनिन हार्मोन के स्राव को दबा देती है, जो नींद लाने में अहम भूमिका निभाता है। यही कारण है कि आधुनिक घरों में इस्तेमाल हो रही तेज LED लाइट्स नींद से जुड़ी समस्याओं को बढ़ा रही हैं और दिमाग को लगातार कंफ्यूज कर रही हैं।