माघ पूर्णिमा का धार्मिक रहस्य और पौराणिक महत्व
माघ पूर्णिमा का दिन हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है। यह तिथि विशेष रूप से स्नान, दान, व्रत और पूजा-पाठ के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। पौराणिक ग्रंथों में माघ पूर्णिमा से जुड़ी कई कथाओं और मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि इस दिन देवतागण भी मनुष्य रूप धारण कर प्रयागराज में संगम स्नान करने आते हैं। इसी दिन कल्पवास का समापन होता है और साधु-संत विशेष स्नान कर धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करते हैं।
देशभर में श्रद्धा के साथ मनाई जा रही माघ पूर्णिमा
आज पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ माघ पूर्णिमा का पर्व मनाया जा रहा है। लाखों श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान कर दान-पुण्य कर रहे हैं और व्रत का संकल्प ले रहे हैं। माना जाता है कि इस दिन किया गया स्नान और दान कई जन्मों के पापों का नाश करता है। प्रयागराज, हरिद्वार, वाराणसी और नासिक जैसे तीर्थ स्थलों पर विशेष भीड़ देखने को मिल रही है।
माघ पूर्णिमा पर चंद्रमा की विशेष स्थिति
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, माघ पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी सभी सोलह कलाओं से पूर्ण रूप से सुशोभित होते हैं। इसी कारण यह तिथि अत्यंत शुभ मानी जाती है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की पूर्ण ऊर्जा पृथ्वी पर सकारात्मक प्रभाव डालती है, जिससे मन, शरीर और आत्मा को शांति प्राप्त होती है। इस दिन किया गया जप-तप और ध्यान विशेष फलदायी माना जाता है।
माघ पूर्णिमा से कलयुग की शुरुआत की मान्यता
माघ पूर्णिमा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण धार्मिक मान्यता यह भी है कि इसी दिन से कलयुग का आरंभ हुआ था। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, माघ पूर्णिमा के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला समाप्त कर वैकुंठ गमन किया था। विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, जिस क्षण भगवान श्रीकृष्ण धरती से विदा हुए, उसी क्षण द्वापर युग का अंत और कलयुग का प्रारंभ माना गया।
मान्यता है कि यह घटना 17 या 18 फरवरी 3102 ईसा पूर्व को माघ पूर्णिमा के दिन हुई थी। इसी कारण यह तिथि युग परिवर्तन का प्रतीक मानी जाती है और इसका विशेष धार्मिक महत्व है।
माघ पूर्णिमा के पुण्य फल और धार्मिक लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माघ पूर्णिमा के दिन विधि-विधान से किया गया स्नान मनुष्य को नर्कगमन से मुक्ति दिलाता है। इस दिन दान, व्रत और जप करने से व्यक्ति को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु की उपासना करने से साधक भवसागर को पार कर विष्णु धाम को प्राप्त करता है।
कलयुग की कुल अवधि और शास्त्रीय वर्णन
शास्त्रों के अनुसार, कलयुग की कुल अवधि 4,32,000 वर्ष मानी गई है। वर्ष 2026 तक कलयुग के लगभग 5,127 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। पुराणों में कलयुग को अधर्म, अन्याय, पाप और अनैतिकता के बढ़ते प्रभाव का युग बताया गया है। हालांकि, इसी युग में भक्ति और नाम स्मरण को सबसे सरल साधन माना गया है।
कलयुग के अंत में कल्कि अवतार की भविष्यवाणी
पुराणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि कलयुग के अंत में भगवान विष्णु कल्कि अवतार लेंगे। यह उनका अंतिम अवतार होगा, जिसका उद्देश्य अधर्म का नाश और धर्म की पुनः स्थापना करना होगा। इस प्रकार माघ पूर्णिमा न केवल धार्मिक आस्था का पर्व है, बल्कि यह युग परिवर्तन और आध्यात्मिक चेतना का भी प्रतीक मानी जाती है।