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राजस्थान में बेणेश्वर मेला 2026: आस्था, परंपरा और आदिवासी संस्कृति का महापर्व

राजस्थान में आदिवासी संस्कृति और धार्मिक आस्था का सबसे बड़ा संगम माने जाने वाला बेणेश्वर मेला एक बार फिर शुरू होने जा रहा है। इसे ‘आदिवासियों का कुंभ’ भी कहा जाता है। यह मेला न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसमें सदियों पुरानी आदिवासी परंपराएं, लोक संस्कृति और सामूहिक आस्था की जीवंत झलक देखने को मिलती है। हर साल की तरह इस बार भी हजारों श्रद्धालु इस पावन आयोजन में शामिल होंगे।

कहां और कब लगेगा बेणेश्वर मेला

बेणेश्वर मेला राजस्थान के डूंगरपुर जिले में सोम, माही और जाखम नदियों के पवित्र त्रिवेणी संगम पर आयोजित किया जाता है। वर्ष 2026 में यह मेला 28 जनवरी से 1 फरवरी तक चलेगा। माघ महीने की शुक्ल एकादशी से शुरू होकर पूर्णिमा तक चलने वाले इस मेले में राजस्थान के साथ-साथ गुजरात और मध्यप्रदेश से भी श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

‘बेणेश्वर’ नाम का धार्मिक महत्व

इस मेले का नाम डूंगरपुर स्थित एक प्राचीन शिव मंदिर में विराजमान पवित्र शिवलिंग बेणेश्वर महादेव के नाम पर पड़ा है। स्थानीय वागड़ी भाषा में ‘बेणेश्वर’ का अर्थ है ‘डेल्टा का स्वामी’। यह स्थान माही और सोम नदियों से बने डेल्टा क्षेत्र में स्थित है, जिसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। यहां भगवान शिव के साथ भगवान विष्णु के वामन या कलगी अवतार का मंदिर भी स्थित है।

अस्थि विसर्जन की परंपरा

बेणेश्वर मेले की सबसे खास परंपरा आदिवासी समुदाय द्वारा अपने दिवंगत पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन करना है। मान्यता है कि त्रिवेणी संगम में अस्थि विसर्जन करने से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। माघ शुक्ल एकादशी के दिन बड़ी संख्या में लोग अपने मृत परिजनों की अस्थियां लेकर यहां आते हैं और विधि-विधान से विसर्जन करते हैं।

संत मावजी महाराज और मेले की कथा

इस मेले के पीछे एक ऐतिहासिक और धार्मिक कथा भी जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि संत मावजी महाराज के दो शिष्यों अजे और वाजे ने सोम और माही नदियों के संगम पर लक्ष्मी-नारायण मंदिर का निर्माण कराया था। माघ शुक्ल एकादशी के दिन मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा हुई और तभी से यह मेला हर साल पांच दिनों तक आयोजित किया जाने लगा।

बनेश्वर महादेव की विशेष पूजा

मेले के पहले दिन मठाधीश कहलाने वाले पुजारी सबला गांव से विशाल जुलूस के साथ मेले स्थल पर पहुंचते हैं। इस दौरान घोड़े पर सवार संत मावजी महाराज की लगभग 16 सेंटीमीटर ऊंची चांदी की प्रतिमा लाई जाती है। मान्यता है कि मठाधीश के स्नान से नदी का जल पवित्र हो जाता है, इसलिए श्रद्धालु उनके साथ स्नान करते हैं।

आदिवासी संस्कृति की अनोखी झलक

बेणेश्वर मेला मुख्य रूप से भील जनजाति का प्रमुख आयोजन है। यहां लोक नृत्य, पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत और आदिवासी जीवनशैली की सजीव झलक देखने को मिलती है। डूंगरपुर, उदयपुर और बांसवाड़ा जिलों से आने वाले हजारों आदिवासी श्रद्धालु बनेश्वर महादेव और मावजी महाराज की पूजा-अर्चना करते हैं। यही कारण है कि बेणेश्वर मेला देश के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण आदिवासी मेलों में गिना जाता है।