दिखने में छोटी लेकिन खतरनाक: ये गलतियां स्टार्टअप की ब्रांडिंग को कर सकती हैं बर्बाद
आज के दौर में स्टार्टअप शुरू करना पहले से कहीं ज्यादा आसान हुआ है, लेकिन उसे सफल और टिकाऊ बनाना अब भी एक बड़ी चुनौती है। बाजार में प्रतिस्पर्धा इतनी तेज है कि केवल अच्छा प्रोडक्ट होना ही काफी नहीं, बल्कि उसे सही तरीके से पेश करना भी उतना ही जरूरी है। यही वजह है कि ब्रांडिंग को किसी भी स्टार्टअप की रीढ़ माना जाता है। इन दिनों शार्क टैंक इंडिया जैसे रियलिटी शो में भी बार-बार इस बात पर जोर दिया जाता है कि ब्रांडिंग कितनी मजबूत है और वह टारगेट ऑडिएंस से कितना जुड़ पा रही है।
ब्रांडिंग को हल्के में लेना पड़ सकता है भारी
कई नए स्टार्टअप फाउंडर यह मान लेते हैं कि एक आकर्षक लोगो, अच्छा नाम और टैगलाइन ही ब्रांडिंग है। यही सबसे बड़ी भूल होती है। असल में ब्रांडिंग इस बात का प्रतिबिंब होती है कि लोग आपके बिजनेस को कैसे देखते हैं और कैसे याद रखते हैं। अगर ब्रांडिंग और बिजनेस की पहचान में तालमेल नहीं होगा, तो ग्राहक लंबे समय तक जुड़ नहीं पाएंगे।
मार्केट रिसर्च की अनदेखी से बिगड़ता है खेल
बिना मार्केट रिसर्च के किया गया कोई भी फैसला जोखिम भरा हो सकता है। कई फाउंडर इसे समय और पैसे की बर्बादी मानते हैं, लेकिन यही रिसर्च आपको यह समझने में मदद करती है कि आपका टारगेट ऑडिएंस क्या चाहता है। अगर आप ग्राहकों की जरूरत और सोच को समझे बिना प्रोडक्ट या ब्रांडिंग तैयार करते हैं, तो उसके असफल होने की संभावना बढ़ जाती है।
बिना ट्रेडमार्क के ब्रांड नेम चुनना
शुरुआती दौर में कई स्टार्टअप बिना जांच-पड़ताल के ब्रांड नेम चुन लेते हैं। शुरुआत में यह समस्या नहीं लगती, लेकिन जैसे-जैसे बिजनेस बढ़ता है, ट्रेडमार्क से जुड़ी दिक्कतें सामने आने लगती हैं। कई बार चुना गया नाम पहले से किसी और के नाम पर रजिस्टर्ड होता है, जिससे या तो ब्रांड बदलना पड़ता है या भारी रकम खर्च करनी पड़ती है।
पहले से चल रहे ब्रांड की नकल करना
कुछ स्टार्टअप पहले से सफल ब्रांड्स की कॉपी करके जल्दी सफलता पाना चाहते हैं। शुरुआत में इससे थोड़ी पहचान मिल सकती है, लेकिन लंबे समय में यह रणनीति नुकसानदायक साबित होती है। कॉपी किए गए आइडिया की अपनी कोई अलग पहचान नहीं बन पाती और एक स्तर के बाद बिजनेस की ग्रोथ रुक जाती है।
बार-बार ब्रांडिंग बदलना बनता है भ्रम की वजह
कई स्टार्टअप अपने लोगो, रंग या फॉन्ट में बार-बार बदलाव करते रहते हैं। भले ही उद्देश्य सुधार का हो, लेकिन लगातार बदलाव से ग्राहक भ्रमित हो जाते हैं। इससे ब्रांड की पहचान कमजोर होती है। बेहतर यही है कि शुरुआत में ही सोच-समझकर ब्रांडिंग की जाए और जरूरत पड़ने पर सीमित बदलाव ही किए जाएं।
स्टोरीटेलिंग को नजरअंदाज करना
हर ब्रांड की एक कहानी होती है, जो उसे खास बनाती है। यह कहानी संघर्ष की हो सकती है, प्रेरणा की हो सकती है या किसी समस्या के समाधान से जुड़ी हो सकती है। अगर फाउंडर अपनी ब्रांड स्टोरी लोगों तक नहीं पहुंचा पाते, तो ब्रांड और ग्राहक के बीच भावनात्मक जुड़ाव नहीं बन पाता।
जटिल ब्रांड मैसेज से दूर होते ग्राहक
कई बार फाउंडर अपने ब्रांड मैसेज को बहुत ज्यादा जटिल बना देते हैं और भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि टारगेट ऑडिएंस तक सही संदेश नहीं पहुंच पाता। ब्रांड का मैसेज जितना सरल और स्पष्ट होगा, उतना ही वह लोगों के दिमाग में टिकेगा।
हर किसी को खुश करने की कोशिश पड़ती है भारी
कुछ स्टार्टअप हर तरह के ग्राहकों को लुभाने की कोशिश में अपनी ब्रांडिंग को कमजोर कर लेते हैं। इससे ब्रांड की स्पष्ट पहचान खत्म हो जाती है। जरूरी है कि पहले यह तय किया जाए कि टारगेट ऑडिएंस कौन है और उसी के अनुसार ब्रांडिंग की जाए।
ब्रांड वॉइस और कस्टमर फीडबैक की अनदेखी
एक मजबूत ब्रांड वॉइस स्टार्टअप की पर्सनैलिटी को दर्शाती है। अगर टोन और भाषा स्पष्ट नहीं होगी, तो ग्राहक कनेक्ट नहीं कर पाएंगे। इसके साथ ही कस्टमर फीडबैक को नजरअंदाज करना भी खतरनाक हो सकता है। ग्राहक अगर बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं, तो समय रहते उसे अपनाना ही समझदारी है।