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सही परवरिश के लिए: बच्चों के साथ-साथ पेरेंट्स का खुद को बेहतर बनाना भी जरूरी

बच्चों की अच्छी परवरिश केवल उन्हें अनुशासन सिखाने या पढ़ाई में आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं होती। वास्तव में, बच्चों का व्यक्तित्व, सोच और व्यवहार काफी हद तक उनके माता-पिता की आदतों और जीवनशैली से प्रभावित होता है। बच्चे वही सीखते हैं, जो वे अपने आसपास देखते हैं। इसलिए अगर पेरेंट्स चाहते हैं कि उनके बच्चे आत्मविश्वासी, जिम्मेदार और संस्कारी बनें, तो उन्हें सबसे पहले खुद की आदतों और व्यवहार पर ध्यान देना होगा। पेरेंट्स का सकारात्मक उदाहरण ही बच्चों के लिए सबसे बड़ा मार्गदर्शन होता है।

गुस्से पर नियंत्रण: मजबूत आत्मविश्वास की नींव

बार-बार गुस्सा करना, डांटना या चिल्लाना बच्चों के मानसिक विकास पर नकारात्मक असर डाल सकता है। इससे बच्चों में डर, असुरक्षा और झिझक पैदा हो सकती है। अगर माता-पिता हर छोटी गलती पर नाराज होते हैं, तो बच्चे अपनी बात खुलकर रखने से कतराने लगते हैं। इसकी बजाय धैर्य और शांति से बच्चों की गलतियों को समझाना ज्यादा प्रभावी होता है। शांत व्यवहार से बच्चे न केवल अपनी गलती समझते हैं, बल्कि समाधान ढूंढना भी सीखते हैं।

स्क्रीन टाइम कम कर बनें बेहतर उदाहरण

आज के डिजिटल दौर में मोबाइल, टीवी और लैपटॉप हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन अगर पेरेंट्स खुद लंबे समय तक स्क्रीन पर व्यस्त रहते हैं, तो बच्चे भी इसे सामान्य आदत मान लेते हैं। इससे न केवल उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है, बल्कि पारिवारिक संवाद भी कम हो जाता है। इसलिए जरूरी है कि माता-पिता अपने स्क्रीन टाइम को सीमित करें और बच्चों के साथ समय बिताएं, ताकि वे भी संतुलित डिजिटल आदतें सीख सकें।

पॉजिटिव भाषा से बढ़ता है बच्चों का आत्मबल

माता-पिता द्वारा बोले गए शब्द बच्चों के मन पर गहरा असर डालते हैं। नकारात्मक शब्द जैसे “तुमसे नहीं होगा” या “तुम बहुत जिद्दी हो” बच्चों के आत्मविश्वास को कमजोर कर सकते हैं। इसके विपरीत, सकारात्मक और प्रेरणादायक शब्द बच्चों में आत्मविश्वास और उत्साह भरते हैं। “तुम मेहनती हो” या “तुम यह कर सकते हो” जैसे वाक्य बच्चों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

खुद अनुशासन में रहें, तभी बच्चे सीखेंगे

अनुशासन सिखाने से पहले पेरेंट्स को खुद इसका पालन करना जरूरी है। अगर माता-पिता समय पर नहीं सोते, अस्वस्थ भोजन करते हैं या अपने वादों को पूरा नहीं करते, तो बच्चे भी वही व्यवहार अपनाते हैं। बच्चे उपदेश से ज्यादा उदाहरण से सीखते हैं। इसलिए स्वस्थ दिनचर्या, समय की पाबंदी और जिम्मेदारी का पालन करके पेरेंट्स बच्चों के लिए एक मजबूत उदाहरण बन सकते हैं।

तुलना नहीं, प्रोत्साहन दें

हर बच्चा अलग होता है और उसकी अपनी क्षमताएं और रुचियां होती हैं। बार-बार भाई-बहनों या दोस्तों से तुलना करने से बच्चे का आत्मसम्मान कमजोर हो सकता है। इससे उनमें हीन भावना भी पैदा हो सकती है। बेहतर होगा कि माता-पिता बच्चे की व्यक्तिगत खूबियों को पहचानें और उसी आधार पर उन्हें प्रोत्साहित करें।

प्यार और सराहना से बनता है भावनात्मक जुड़ाव

बच्चों को केवल अनुशासन ही नहीं, बल्कि प्यार और भावनात्मक सुरक्षा भी चाहिए होती है। उनकी छोटी-छोटी उपलब्धियों की तारीफ करना, उन्हें गले लगाना और उनके प्रयासों की सराहना करना बच्चों के मानसिक विकास के लिए बहुत जरूरी है। इससे बच्चे खुद को समझा हुआ और स्वीकार किया हुआ महसूस करते हैं।

सेहतमंद आदतें अपनाएं और खुला संवाद रखें

अगर माता-पिता खुद अपनी सेहत, खान-पान और दिनचर्या का ध्यान रखते हैं, तो बच्चे भी वही आदतें अपनाते हैं। साथ ही, घर में खुले संवाद का माहौल होना बेहद जरूरी है। जब पेरेंट्स बच्चों की बातें ध्यान से सुनते हैं और बिना आलोचना के समझने की कोशिश करते हैं, तो बच्चे अपनी भावनाएं और समस्याएं खुलकर साझा कर पाते हैं। यही स्वस्थ और सकारात्मक परवरिश की असली पहचान है।