News Image

चार दिवसीय पोंगल पर्व का आज से आगाज, भोगी पोंगल से होती है उत्सव की शुरुआत

दक्षिण भारत का प्रमुख और पारंपरिक पर्व पोंगल आज से शुरू हो गया है। यह चार दिनों तक चलने वाला उत्सव खासतौर पर तमिलनाडु और दुनिया भर में बसे तमिल समुदाय द्वारा बड़े श्रद्धा, उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। पोंगल पर्व का पहला दिन भोगी पोंगल कहलाता है, जिसे पुराने को त्यागकर नए और सकारात्मक जीवन की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भोगी पोंगल का अर्थ और सांस्कृतिक महत्व

भोगी पोंगल का मूल भाव परिवर्तन और शुद्धिकरण से जुड़ा है। इस दिन लोग अपने घरों, आंगन और आसपास के क्षेत्रों की विशेष रूप से साफ-सफाई करते हैं। पुराने, टूटे-फूटे और बेकार सामान को घर से बाहर निकालकर अलाव में जलाया जाता है। यह परंपरा केवल भौतिक वस्तुओं को त्यागने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे यह भावना जुड़ी होती है कि जीवन से नकारात्मक विचार, पुरानी परेशानियां और दुर्भावनाएं भी दूर हों। मान्यता है कि इस प्रक्रिया से घर में सकारात्मक ऊर्जा, सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है।

भगवान इंद्र की पूजा और वर्षा के प्रति कृतज्ञता

भोगी पोंगल का दिन वर्षा के देवता भगवान इंद्र को समर्पित होता है। कृषि प्रधान समाज में वर्षा का विशेष महत्व होता है, क्योंकि फसल की सफलता काफी हद तक बारिश पर निर्भर करती है। इस दिन भगवान इंद्र की पूजा कर अच्छी वर्षा, समृद्ध फसल और खुशहाल जीवन की कामना की जाती है। किसान और ग्रामीण समाज इस पर्व के माध्यम से प्रकृति और देवताओं के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं।

कोलम और पारंपरिक सजावट की परंपरा

भोगी पोंगल के अवसर पर घरों के सामने रंग-बिरंगे कोलम बनाए जाते हैं। महिलाएं चावल के आटे से सुंदर और जटिल डिजाइनों में कोलम सजाती हैं। इन कोलमों में कद्दू के फूल लगाए जाते हैं और बीच में गोबर के उपले रखकर उन पर दीये जलाए जाते हैं। यह सजावट घर की समृद्धि और मंगलकामना का प्रतीक मानी जाती है। कई घरों में ‘बोम्मला कोलुवु’ भी सजाया जाता है, जिसमें सीढ़ीनुमा संरचना पर विभिन्न प्रकार की गुड़ियों को सुसज्जित किया जाता है, जो पारिवारिक और सांस्कृतिक परंपराओं को दर्शाता है।

खास पकवान और कृषि से जुड़ी रस्में

भोगी पोंगल के दिन घरों में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। नई फसल के चावल, गन्ना और हल्दी का भोजन में खास उपयोग किया जाता है। मिठाइयां बनाकर उन्हें परिवार, रिश्तेदारों और पड़ोसियों में बांटा जाता है, जिससे आपसी प्रेम और सौहार्द बढ़ता है। इस दिन किसान अपने हल, कुदाल और अन्य कृषि औजारों की पूजा करते हैं। इन औजारों पर कुमकुम और चंदन लगाकर सूर्य देव और धरती माता को अर्पित किया जाता है, ताकि आने वाली फसल अच्छी हो।

बच्चों से जुड़ी विशेष परंपराएं और मान्यताएं

भोगी पोंगल बच्चों के लिए भी विशेष महत्व रखता है। इस दिन ‘रेगी पल्लू’ की रस्म निभाई जाती है, जिसमें छोटे बच्चों पर बेर, भीगी हुई चना दाल, फूलों की पंखुड़ियां, गन्ने के टुकड़े, गुड़ और सिक्के डाले जाते हैं। मान्यता है कि इससे बच्चों को नजर नहीं लगती और उन्हें अच्छा स्वास्थ्य तथा लंबी उम्र का आशीर्वाद मिलता है। इसके अलावा ‘अरिसेलु अडुगुलु’ नामक रस्म भी की जाती है, जिसमें बच्चे के पहले कदम रखने की खुशी पूरे परिवार के साथ मनाई जाती है।

परंपरा, प्रकृति और सामूहिकता का पर्व

भोगी पोंगल केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि जीवन में सकारात्मक बदलाव, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामाजिक एकता का संदेश देता है। चार दिवसीय पोंगल पर्व की यह शुरुआत पूरे उत्सव को आनंद, उल्लास और सांस्कृतिक गौरव से भर देती है।

डिस्क्लेमर:- यह लेख सामान्य मान्यताओं और जानकारियों  पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए स्वामी न्यूज उत्तरदायी नहीं है।