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जेनरेशन जेड (Z) की आदतें बन रहीं सेहत की दुश्मन, आयुर्वेद ने बताए इसके गंभीर संकेत

कहा जाता है कि इंसान की आदतें ही उसके स्वास्थ्य की नींव रखती हैं। यह बात आज की युवा पीढ़ी यानी जेनरेशन जेड पर पूरी तरह लागू होती है। साल 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवाओं की जीवनशैली पिछली पीढ़ियों से काफी अलग है। देर रात तक जागना, सोशल मीडिया पर घंटों समय बिताना, समय पर भोजन न करना और थकान दूर करने के लिए कॉफी या एनर्जी ड्रिंक्स का सहारा लेना अब आम हो गया है। हालांकि ये आदतें देखने में सामान्य लगती हैं, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार इनका शरीर और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

आयुर्वेद क्या कहता है जीवनशैली को लेकर

आयुर्वेद के अनुसार रोजमर्रा की दिनचर्या सीधे तौर पर शरीर के हॉर्मोन, मेटाबॉलिज्म और मानसिक संतुलन को प्रभावित करती है। जेनरेशन जेड जानबूझकर अपनी सेहत से खिलवाड़ नहीं कर रही, बल्कि वे लगातार उत्तेजना, काम के दबाव और मानसिक थकान में जी रहे हैं। बिना पर्याप्त आराम के लगातार एक्टिव रहने की आदत धीरे-धीरे शरीर की प्राकृतिक लय को बिगाड़ देती है, जिसका असर लंबे समय तक देखने को मिलता है।

रात की नींद और शरीर की घड़ी का गहरा संबंध

आयुर्वेद में दिनचर्या को विशेष महत्व दिया गया है। शरीर की अपनी एक जैविक घड़ी होती है, जो समय पर सोने और जागने से संतुलित रहती है। जब कोई व्यक्ति लगातार देर रात तक जागता है, तो इससे हॉर्मोनल बैलेंस बिगड़ने लगता है। कोर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हॉर्मोन का स्तर बढ़ जाता है और इंसुलिन सेंसिटिविटी कम होने लगती है। इसका परिणाम थकान, बेचैनी और भूख के संकेतों में भ्रम के रूप में सामने आता है।

आयुर्वेद के अनुसार देर रात जागने से वात और कफ दोष का संतुलन बिगड़ता है। इससे पाचन शक्ति कमजोर होती है और फैट मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ने लगता है। शरीर ऊर्जा को खर्च करने की बजाय जमा करने लगता है, जिससे वजन बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है, खासकर पेट के आसपास।

बर्नआउट केवल मानसिक समस्या नहीं

आधुनिक जीवन में बर्नआउट को अक्सर मानसिक या भावनात्मक समस्या मान लिया जाता है, लेकिन आयुर्वेद इसे पूरे शरीर की प्रणाली से जुड़ी स्थिति मानता है। जब दिमाग को लगातार बिना आराम दिए काम में लगाया जाता है, तो नर्वस सिस्टम हमेशा अलर्ट मोड में रहता है। इससे नींद, भूख और मूड को नियंत्रित करने वाले हॉर्मोन प्रभावित होते हैं। धीरे-धीरे व्यक्ति चिड़चिड़ापन, थकान और मोटिवेशन की कमी महसूस करने लगता है।

शरीर पर दिखने लगते हैं ये संकेत

इस असंतुलित जीवनशैली का असर धीरे-धीरे शरीर पर साफ नजर आने लगता है। देर रात खाने की तीव्र इच्छा बढ़ जाती है, खाने के बाद भी पेट पूरी तरह भरा हुआ महसूस नहीं होता, मूड स्विंग्स आम हो जाते हैं और पेट के आसपास वजन बढ़ने लगता है। ये सभी संकेत बताते हैं कि शरीर का मेटाबॉलिज्म प्रभावित हो चुका है।

बिगड़ता मेटाबॉलिज्म और कमजोर पाचन

जेनरेशन जेड की ईटिंग हैबिट्स में प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन और अनियमित समय पर भोजन करना शामिल है। आयुर्वेद के अनुसार इससे जठराग्नि कमजोर हो जाती है, जिससे भोजन से मिलने वाला पोषण शरीर ठीक से ग्रहण नहीं कर पाता। इस स्थिति में ‘आम’ यानी टॉक्सिन बनने लगते हैं, जो ब्लोटिंग, त्वचा संबंधी समस्याएं, मानसिक थकावट और जिद्दी वजन बढ़ने का कारण बनते हैं।

आयुर्वेद किसी भी भोजन को पूरी तरह अच्छा या बुरा नहीं मानता, बल्कि उसके समय, मात्रा और नियमितता पर जोर देता है। देर रात भारी भोजन या बार-बार स्नैकिंग पाचन तंत्र पर दबाव डालती है और मेटाबॉलिज्म को और धीमा कर देती है।

छोटे बदलाव, बड़ा फायदा

आयुर्वेद के अनुसार संतुलन लाने के लिए परफेक्शन की जरूरत नहीं होती। छोटे-छोटे बदलाव लंबे समय तक बड़ा लाभ दे सकते हैं। आधी रात से पहले सोने की आदत डालना, दिन में कुछ मिनट शांत बैठकर सांसों पर ध्यान देना और खाने के समय को नियमित करना नर्वस सिस्टम को धीरे-धीरे संतुलित करता है। पाचन और नींद में सुधार आने से हॉर्मोन भी संतुलन में आने लगते हैं, जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों बेहतर होते हैं।