जब देश भूखा था, तब प्रधानमंत्री ने खुद रखा उपवास: लाल बहादुर शास्त्री सादगी की अमिट मिसाल
भारत के राजनीतिक इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो शोरगुल से दूर रहकर भी देश की दिशा बदल देते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ऐसे ही नेताओं में शामिल थे। उनकी पुण्यतिथि हर वर्ष 11 जनवरी को मनाई जाती है। यह दिन केवल उन्हें याद करने का अवसर नहीं, बल्कि उनके मूल्यों, त्याग और नैतिक राजनीति से सीख लेने का संदेश भी देता है। शास्त्री जी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सत्ता का उद्देश्य सेवा होना चाहिए, न कि सुविधा और वैभव।
सादगी में छिपी थी उनकी महानता
लाल बहादुर शास्त्री सादगी की सजीव प्रतिमूर्ति थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने कभी तामझाम को अपने जीवन का हिस्सा नहीं बनाया। वे रेल की सेकेंड क्लास यात्रा को भी सम्मान के साथ स्वीकार करते थे। न उनके पास भव्य बंगला था और न ही बड़े बैंक बैलेंस। उनका विश्वास जनता पर था और जनता का भरोसा उनके चरित्र पर। उनका मानना था कि नेता का कद उसके आचरण से तय होता है, न कि उसके ठाठ-बाट से।
‘जय जवान, जय किसान’ का ऐतिहासिक संदेश
1965 के भारत-पाक युद्ध और देश में खाद्यान्न संकट के दौर में दिया गया नारा ‘जय जवान, जय किसान’ आज भी प्रासंगिक है। इस एक वाक्य में शास्त्री जी ने भारत की आत्मा को समेट दिया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि देश की रक्षा सीमा पर तैनात जवान करता है और देश का पेट भरने का काम किसान करता है। यह नारा केवल शब्द नहीं था, बल्कि राष्ट्र निर्माण की स्पष्ट नीति और प्राथमिकताओं का प्रतीक था।
गरीबी और संघर्ष से भरा बचपन
लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 1904 में मुगलसराय में हुआ। उन्होंने बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताया। बचपन में ही पिता का साया उठ गया, जिसके बाद परिवार आर्थिक तंगी से जूझता रहा। स्कूल जाने के लिए उन्हें गंगा नदी नाव से पार करनी पड़ती थी और कई बार भूखे पेट पढ़ाई करनी पड़ी। ये अनुभव उनके व्यक्तित्व को मजबूत बनाते गए और उन्हें आम आदमी के दर्द से जोड़ते रहे।
प्रधानमंत्री रहते हुए भी निजी त्याग
जब देश गंभीर आर्थिक संकट और खाद्यान्न की कमी से जूझ रहा था, तब शास्त्री जी ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने की अपील की। यह अपील सिर्फ भाषण तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने खुद इसका पूरी निष्ठा से पालन किया। वे मानते थे कि जब देश संकट में हो, तो नेता को सबसे पहले त्याग का उदाहरण पेश करना चाहिए। उन्होंने अपने परिवार की सुख-सुविधाओं को भी देशहित में पीछे रखा।
ताशकंद समझौता और रहस्यमयी अंत
1966 में ताशकंद में भारत-पाक शांति समझौते के बाद 10 जनवरी को लाल बहादुर शास्त्री का निधन हो गया। आधिकारिक रूप से इसे दिल का दौरा बताया गया, लेकिन उनकी मृत्यु आज भी कई सवालों से घिरी हुई है। उनके परिवार और कई विशेषज्ञों ने समय-समय पर इसकी निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। देश ने एक ईमानदार और समर्पित नेता खो दिया, लेकिन उनकी मृत्यु का रहस्य अब भी पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है।
संस्कारों से उपजा नेतृत्व
लाल बहादुर शास्त्री न तो करिश्माई वक्ता थे और न ही जनभावनाओं को उकसाने वाले नेता। उनकी असली ताकत नैतिक साहस और ईमानदारी थी। वे निर्णय लेते समय लोकप्रियता की नहीं, बल्कि राष्ट्रहित की चिंता करते थे। आज के दौर में जब राजनीति प्रदर्शन और प्रचार का मंच बन चुकी है, शास्त्री जी का जीवन यह याद दिलाता है कि सच्चा नेतृत्व चरित्र और संस्कार से जन्म लेता है, सत्ता से नहीं।