अक्षरधाम में 108 फुट ऊंची दिव्य प्रतिमा, श्रद्धा और तप का प्रतीक
देश की राजधानी नई दिल्ली में स्थित स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर पहले से ही अपनी भव्य वास्तुकला, आध्यात्मिक वातावरण और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। अब इस परिसर में एक और दिव्य आकर्षण जुड़ गया है। अक्षरधाम परिसर में स्थापित की जा रही नीलकंठ वर्णी की विशाल प्रतिमा दूर से ही लोगों का ध्यान खींच रही है। 108 फुट ऊंची यह स्वामीनारायण तप प्रतिमा सोने जैसी चमक के साथ खड़ी है, जिसे आसपास के फ्लाईओवर और दूर-दराज के इलाकों से भी देखा जा सकता है।
108 फुट ऊंची स्वामीनारायण तप प्रतिमा की विशेषताएं
इस विशाल प्रतिमा में युवा संत नीलकंठ वर्णी को एक पैर पर खड़े हुए दर्शाया गया है। उनकी दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठी हुई हैं और चेहरा गहरी ध्यान अवस्था में लीन है। यह मुद्रा तप, साधना और आत्मसंयम का प्रतीक मानी जाती है। प्रतिमा की बनावट, ऊंचाई और चमक इसे अक्षरधाम परिसर की सबसे विशिष्ट संरचनाओं में शामिल करती है। इसकी ऊंचाई और दिव्यता इतनी प्रभावशाली है कि यह आसपास के शहरी ढांचे के बीच भी अलग पहचान बनाती है।
अभी बाकी है आधिकारिक अनावरण
हालांकि नीलकंठ वर्णी की इस भव्य प्रतिमा का अभी तक औपचारिक रूप से अनावरण नहीं किया गया है, लेकिन इसके आधार और आसपास के निर्माण कार्य तेजी से पूरे किए जा रहे हैं। मंदिर प्रशासन से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इस वर्ष मार्च महीने तक प्रतिमा का अभिषेक और पूजा समारोह आयोजित किए जाने की संभावना है। अनावरण के बाद यह प्रतिमा श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए पूरी तरह से दर्शन के लिए खोल दी जाएगी।
किशोरावस्था के स्वामीनारायण से प्रेरित प्रतिमा
अक्षरधाम में स्थापित की जा रही यह प्रतिमा भगवान स्वामीनारायण के किशोर जीवन से प्रेरित है, जब वे नीलकंठ वर्णी के नाम से जाने जाते थे। मात्र 11 वर्ष की आयु में उन्होंने उत्तर प्रदेश में स्थित अपना घर त्याग दिया था। कमर में केवल एक वस्त्र बांधकर उन्होंने सादा और तपस्वी जीवन अपनाया। इसके बाद उन्होंने लगभग सात वर्षों तक पैदल यात्रा करते हुए भारत, नेपाल, तिब्बत, भूटान और बांग्लादेश जैसे क्षेत्रों में हजारों किलोमीटर की दूरी तय की।
मुक्तिनाथ की तपस्या को दर्शाती मुद्रा
प्रतिमा में दर्शाई गई ध्यान मुद्रा नेपाल के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल मुक्तिनाथ में की गई उनकी गहन तपस्या से प्रेरित है। वहां नीलकंठ वर्णी एक पैर पर खड़े होकर दोनों हाथ ऊपर उठाकर गहरी साधना में लीन रहे थे। यह कालखंड उनके जीवन में त्याग, आत्मअनुशासन और अध्ययन का महत्वपूर्ण चरण माना जाता है, जिसने आगे चलकर उनकी शिक्षाओं की नींव रखी।
अक्षरधाम और सनातन संस्कृति से जुड़ाव
दिल्ली का अक्षरधाम देश के सबसे अधिक देखे जाने वाले सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्थलों में से एक है। यहां स्थापित होने वाली यह नई प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए आस्था का नया केंद्र बनेगी। स्वामीनारायण परंपरा के अन्य मंदिरों की तरह यह प्रतिमा भी लोगों को सनातन संस्कृति, मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना से जोड़ने का कार्य करेगी। इसी तरह की विशाल प्रतिमाएं गांधीनगर और अमेरिका के न्यू जर्सी स्थित स्वामीनारायण मंदिरों में भी स्थापित हैं।
नीलकंठ वर्णी का जीवन परिचय
भगवान स्वामीनारायण का जन्म सन् 1781 में उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के पास हुआ था। उन्होंने अपना प्रारंभिक जीवन छपैया और अयोध्या में बिताया। किशोर अवस्था में ही नीलकंठ वर्णी ने नंगे पैर लंबी यात्राएं शुरू कीं। इस दौरान वे विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से मिले और उनसे जीवन, करुणा, आस्था और आत्मिक शक्ति के गहरे अर्थ सीखे। अक्षरधाम में स्थापित यह प्रतिमा उनके उसी तपस्वी और प्रेरणादायक जीवन की जीवंत झलक प्रस्तुत करती है।