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मकर संक्रांति पर काले वस्त्र क्यों माने जाते हैं शुभ? जानिए धार्मिक और सांस्कृतिक कारण

  
    

मकर संक्रांति भारत के प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्वों में से एक है, जिसे देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिससे उत्तरायण काल का आरंभ माना जाता है। आमतौर पर हिंदू परंपराओं में काले रंग को शुभ कार्यों से दूर रखा जाता है, लेकिन मकर संक्रांति के अवसर पर विशेष रूप से, खासकर महाराष्ट्र में, काले रंग के वस्त्र पहनने की परंपरा प्रचलित है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनिदेव की राशि मकर में प्रवेश करते हैं। इसे सूर्य और शनि के संबंधों में मधुरता का प्रतीक माना जाता है। शनिदेव का प्रिय रंग काला माना जाता है, इसलिए इस दिन काले वस्त्र धारण कर उन्हें प्रसन्न करने की परंपरा है। मान्यता है कि ऐसा करने से शनिदेव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।

महाराष्ट्र में इस परंपरा का विशेष महत्व है। यहां महिलाएं काली साड़ी या काले परिधान पहनती हैं, जबकि पुरुष काले कुर्ते, पजामे या शर्ट धारण करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी पूरी आस्था के साथ निभाई जाती है।

सामान्य दिनों में काले रंग को नकारात्मक ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है, इसलिए विवाह, पूजा और अन्य शुभ अवसरों पर इससे परहेज किया जाता है। हालांकि मकर संक्रांति पर धार्मिक मान्यताओं और मौसम संबंधी कारणों के चलते काला रंग शुभ माना जाता है।

इसके साथ ही मकर संक्रांति पर पीले रंग का भी विशेष महत्व है। पीले वस्त्र पहनना और पीले रंग के खाद्य पदार्थ जैसे खिचड़ी का सेवन समृद्धि, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है।

मकर संक्रांति न केवल ऋतु परिवर्तन का पर्व है, बल्कि यह धार्मिक आस्था, सामाजिक समरसता और परंपराओं को सहेजने का भी महत्वपूर्ण अवसर है।

अस्वीकरण:
यह जानकारी सामान्य धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिष एवं शास्त्रीय संदर्भों पर आधारित है।